Majboori Shayari in Hindi
वह मान ना सके गुजारिश हमारी,
मजबूरी हमारी वह जान ना सके,
कहते हे याद रखेंगे मरते दम तक
जीते जी पहचान ना सके।
बुरे वक्त में मांगों किसी से मदद
लोग अपनी मजबुरियां बताने लगते हैं,
वो अपने ही होते हैं जनाब
जो बुरे वक़्त में साथ छोड़ देते हैं।
वक्त नूर को बेनूर कर देता हैं,
छोटे से जख्म को नासूर कर देता है,
कौन चाहता है अपने से दूर होना,
लेकिन वक्त सबको मजबूर कर देता हैं...
हिम्मत तो इतनी थी कि
समुद्र भी पार कर सकते थे,
मजबूर इतना हुए कि
दो बुंद आंसूओं ने डुबा दिया।
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फिर यूँ हुआ कि जब भी
जरुरत पड़ी मुझे
हर शख्स इत्तेफाक से
मजबूर हो गया...
ना कोई लाचारी है ना कोई मजबूरी है,
बेवफाई उसकी पैदायशी बीमारी है...
हम मजबूरी में काम करते रह हर वक्त
जब लौट के आये कोई था ही नहीं हमारा।
हमें सीने से लगाकर हमारी सारी कसक दूर कर दो,
हम सिर्फ तुम्हारे हो जाएँ हमें इतना मजबूर कर दो!
अगर तेरी मजबूरी है भूल जाने की
तो मेरी आदत है तुझे याद रखने की।
कितने मजबूर हैं हम प्यार के हाथों,
ना तुझे पाने की औकात ना तुझे खोने का हौसला।
किसी की मजबूरी का मजाक ना
बनाओ यारों, जिंदगी कभी मौका
देती है तो कभी धोखा भी देती है।
मैं मजबूरियां ओढ़ कर निकलता हूँ
घर से आज कल,
वरना शौक तो आज भी है
बारिशों में भीगने का।
ना जाने क्या मजबूरी है उनकी
मुझे देखकर नजरें झुका लेती है,
कभी देखने को तरसती थी अब क्यों
दिल की बात दिल में दबा लेती है।
अगर तेरी मजबूरी हे ख़ामोशी तो
रहने दे इश्क कौनसा जरुरी हैं।
रिश्तों को निभाने की मजबूरी पुरानी है,
जिंदगी तो जैसे समझौतों की कहानी है,
दुनिया के अंदर तो धोखे का समंदर है,
यहाँ करते है वफ़ा, मिलती बदनामी है।
किसी की अच्छाई का इतना भी
फायदा मत उठाओ,
कि वो बुरा बनने के लिए
मजबूर हो जाये।
तुम बेवफा नहीं ये तो धड़कने
भी कहती हैं,
अपनी मजबूरी का एक
पैगाम तो भेज देते।
बहाना बनाते है लोग,
अपनी मजबूरी बताकर,
किसी का दिल भी टूट जाये,
तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता उन्हें।
खामोशी समझदारी भी है
और मजबूरी भी,
कहीं नज़दीकियां बढ़ाती है
और कहीं दूरी भी...
बहाना कोई तो दे ए ज़िंदगी कि
जीने के लिए मैं भी मजबूर हो जाऊँ।
ये जिंदगी है साहब
यह हर कोई मजबूर है,
कोई टूट जाता है मजबूरियों में
तो कोई मजबूरियों से लड़कर मशहुर है।
ज़िंदगी में कुछ ऐसे रास्ते भी आते
कभी-कभी जंहा से गुजरना सिर्फ़
और सिर्फ़ मज़बूरी होती हैं।
जीना चाहा तो जिंदगी से दूर थे हम,
मरना चाहा तो जीने को मजबूर थे हम,
सर झुका कर कबूल कर ली हर सजा,
बस कसूर इतना था कि बेकसूर थे हम।
ये मज़बूरी ही है जनाब,
जो हमें अंदर से खोकला बनाती है,
इससे बच के रहना जनाब,
ये इंसान की जान लेने में,
बिलकुल भी नहीं हिचकिचाती है...
हर इंसान यहा बिकता है,
कितना सस्ता या कितना महंगा
यह उसकी मज़बूरी तय करती है...

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